中文圣经

अय्यूब 4

ज्ञात 0/183

tí màn rén yǐ lì fǎ huí dá shuō :

तब तेमानी एलीपज ने कहा,

rén ruò xiǎng yǔ nǐ shuō huà , nǐ jiù yàn fán ma ? dàn shuí néng rěn zhù bù shuō ne ?

“यदि कोई तुझ से कुछ कहने लगे, तो क्या तुझे बुरा लगेगा? परन्तु बोले बिना कौन रह सकता है?

nǐ sù lái jiào dǎo xǔ duō de rén , yòu jiān gù ruǎn ruò de shǒu 。

सुन, तूने बहुतों को शिक्षा दी है, और निर्बल लोगों को बलवन्त किया है4:3 निर्बल लोगों को बलवन्त किया है: हम अपने हाथों द्वारा ही काम करते हैं और दुर्बल हाथ असहाय अवस्था को दर्शाते हैं।।

使

nǐ de yán yǔ céng fú zhù nà jiāng yào diē dǎo de rén ; nǐ yòu shǐ ruǎn ruò de xī wěn gù 。

गिरते हुओं को तूने अपनी बातों से सम्भाल लिया, और लड़खड़ाते हुए लोगों को तूने बलवन्त किया4:4 लड़खड़ाते हुए लोगों को तूने बलवन्त किया: घुटने हमारी देह को सहारा देते हैं। यदि घुटने टूट जाएँ तो हम दुर्बल और असहाय हो जाते हैं।।

便

dàn xiàn zài huò huàn lín dào nǐ , nǐ jiù hūn mí , āi jìn nǐ , nǐ biàn jīng huáng 。

परन्तु अब विपत्ति तो तुझी पर आ पड़ी, और तू निराश हुआ जाता है; उसने तुझे छुआ और तू घबरा उठा।

nǐ de yǐ kào bú shì zài nǐ jìng wèi shén ma ? nǐ de pàn wàng bú shì zài nǐ xíng shì chún zhèng ma ?

क्या परमेश्वर का भय ही तेरा आसरा नहीं? और क्या तेरी चाल चलन जो खरी है तेरी आशा नहीं?

qǐng nǐ zhuī xiǎng : wú gū de rén yǒu shuí miè wáng ? zhèng zhí de rén zài hé chù jiǎn chú ?

“क्या तुझे मालूम है कि कोई निर्दोष भी कभी नाश हुआ है? या कहीं सज्जन भी काट डाले गए?

àn wǒ suǒ jiàn , gēng zuì niè 、 zhǒng dú hài de rén dōu zhào yàng shōu gē 。

मेरे देखने में तो जो पाप को जोतते और दुःख बोते हैं, वही उसको काटते हैं।

shén yì chū qì , tā men jiù miè wáng ; shén yì fā nù , tā men jiù xiāo méi 。

वे तो परमेश्वर की श्वास से नाश होते, और उसके क्रोध के झोंके से भस्म होते हैं। (2 थिस्स. 2:8, यशा. 30:33)

齿

shī zi de hǒu jiào hé měng shī de shēng yīn jìn dōu zhǐ xī ; shào zhuàng shī zi de yá chǐ yě dōu qiāo diào 。

सिंह का गरजना और हिंसक सिंह का दहाड़ना बन्द हो जाता है। और जवान सिंहों के दाँत तोड़े जाते हैं।

lǎo shī zi yīn jué shí ér sǐ ; mǔ shī zhī zǐ yě dōu lí sàn 。

शिकार न पाकर बूढ़ा सिंह मर जाता है, और सिंहनी के बच्चे तितर बितर हो जाते हैं।

wǒ àn àn dì dé le mò shì ; wǒ ěr duo yě tīng qí xì wēi de shēng yīn 。

“एक बात चुपके से मेरे पास पहुँचाई गई, और उसकी कुछ भनक मेरे कान में पड़ी।

zài sī niàn yè zhōng 、 yì xiàng zhī jiān , shì rén chén shuì de shí hòu ,

रात के स्वप्नों की चिन्ताओं के बीच जब मनुष्य गहरी निद्रा में रहते हैं,

使

kǒng jù 、 zhàn jīng lín dào wǒ shēn , shǐ wǒ bǎi gǔ dǎ zhàn 。

मुझे ऐसी थरथराहट और कँपकँपी लगी कि मेरी सब हड्डियाँ तक हिल उठी।

yǒu líng cóng wǒ miàn qián jīng guò , wǒ shēn shàng de háo máo zhí lì 。

तब एक आत्मा मेरे सामने से होकर चली; और मेरी देह के रोएँ खड़े हो गए।

nà líng tíng zhù , wǒ què bù néng biàn qí xíng zhuàng ; yǒu yǐng xiàng zài wǒ yǎn qián 。 wǒ zài jìng mò zhōng tīng jiàn yǒu shēng yīn shuō :

वह चुपचाप ठहर गई और मैं उसकी आकृति को पहचान न सका। परन्तु मेरी आँखों के सामने कोई रूप था; पहले सन्नाटा छाया रहा, फिर मुझे एक शब्द सुन पड़ा,

bì sǐ de rén qǐ néng bǐ shén gōng yì ma ? rén qǐ néng bǐ zào tā de zhǔ jié jìng ma ?

‘क्या नाशवान मनुष्य परमेश्वर से अधिक धर्मी होगा? क्या मनुष्य अपने सृजनहार से अधिक पवित्र हो सकता है?

使

zhǔ bú xìn kào tā de chén pú , bìng qiě zhǐ tā de shǐ zhě wèi yú mèi ;

देख, वह अपने सेवकों पर भरोसा नहीं रखता, और अपने स्वर्गदूतों को दोषी ठहराता है;

hé kuàng nà zhù zài tǔ fáng 、 gēn jī zài chén tǔ lǐ 、 bèi dù chóng suǒ huǐ huài de rén ne ?

फिर जो मिट्टी के घरों में रहते हैं, और जिनकी नींव मिट्टी में डाली गई है, और जो पतंगे के समान पिस जाते हैं, उनकी क्या गणना। (2 कुरि. 5:1)

zǎo wǎn zhī jiān , jiù bèi huǐ miè , yǒng guī wú yǒu , wú rén lǐ huì 。

वे भोर से साँझ तक नाश किए जाते हैं4:20 वे भोर से साँझ तक नाश किए जाते हैं: कहने का अर्थ यह नहीं कि सुबह से शाम तक विनाश का कार्य चलता है अपितु यह कि मनुष्य का जीवन बहुत ही छोटा है, इतना छोटा है कि वह सुबह से रात तक जीवित रहता है।, वे सदा के लिये मिट जाते हैं, और कोई उनका विचार भी नहीं करता।

tā zhàng péng de shéng suǒ qǐ bù cóng zhōng chōu chū lái ne ? tā sǐ , qiě shì wú zhì huì ér sǐ 。

क्या उनके डेरे की डोरी उनके अन्दर ही अन्दर नहीं कट जाती? वे बिना बुद्धि के ही मर जाते हैं?’

इस अध्याय पर स्वयं को परखें

10 शब्दों की त्वरित प्रश्नोत्तरी।